चंडीगढ़ न्यूज डेस्क: चंडीगढ़ और आसपास के क्षेत्रों में भविष्य में आने वाले किसी बड़े हिमालयी भूकंप के दौरान हजारों आवासीय और व्यावसायिक इमारतों को गंभीर खतरे का सामना करना पड़ सकता है। एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि शहर की भौगोलिक और भूगर्भीय परिस्थितियां भूकंपीय झटकों की तीव्रता को कई गुना बढ़ा सकती हैं, जिससे नुकसान का जोखिम बढ़ जाएगा।
हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए इस अध्ययन में पाया गया है कि चंडीगढ़ की कई पुरानी दो मंजिला इमारतें, जिनमें भूकंपरोधी तकनीकों का इस्तेमाल नहीं किया गया है, विशेष रूप से संवेदनशील हैं। इसके अलावा तेजी से बढ़ रही बहुमंजिला इमारतों को भी भूकंप के दृष्टिकोण से गंभीरता से जांचने की जरूरत बताई गई है। शोधकर्ताओं ने शहरी नियोजन और भवन निर्माण नियमों में वैज्ञानिक निष्कर्षों को शामिल करने की सिफारिश की है।
जर्नल ऑफ एप्लाइड जियोफिजिक्स में प्रकाशित इस अध्ययन के तहत 2021 से 2023 के बीच शहर के 200 स्थानों पर विस्तृत भू-भौतिकीय सर्वेक्षण किए गए। जांच में सामने आया कि चंडीगढ़ की जमीन के नीचे मिट्टी, रेत, बजरी और गाद की मोटी परतें मौजूद हैं, जो भूकंप के दौरान झटकों को और अधिक तीव्र बना सकती हैं। शोध के अनुसार कुछ इलाकों में भूकंपीय तरंगों की तीव्रता सामान्य से 2 से 3.5 गुना तक बढ़ सकती है।
अध्ययन में यह भी कहा गया है कि हिमालयी भूकंपीय क्षेत्र के निकट होने के कारण चंडीगढ़ पहले से ही संवेदनशील इलाके में स्थित है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में कोई बड़ा भूकंप आता है तो स्थानीय भू-संरचना के कारण नुकसान का स्तर बढ़ सकता है। शोधकर्ताओं ने प्रशासन, इंजीनियरों और आपदा प्रबंधन एजेंसियों से अपील की है कि वे इन निष्कर्षों के आधार पर सुरक्षित भवन निर्माण, भूमि उपयोग और आपदा तैयारी की रणनीतियों को मजबूत करें।