चंडीगढ़ न्यूज डेस्क: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने 700 करोड़ रुपये के वित्तीय घोटाले की जांच के मामले में चंडीगढ़ पुलिस और यूटी (UT) प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल खड़े किए हैं। आईडीएफसी फर्स्ट बैंक (IDFC First Bank) द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने जांच प्रक्रिया में प्रशासनिक हस्तक्षेप और खातों को अनफ्रीज करने के प्रयासों पर जवाब मांगा है।
मामले के मुख्य बिंदु:
जांच का हस्तांतरण: मामले की गंभीरता को देखते हुए 27 अप्रैल को इस घोटाले की जांच औपचारिक रूप से सीबीआई (CBI) को सौंप दी गई थी। गृह मंत्रालय की एनओसी (NOC) के बाद सीबीआई ने नियमित मामला (RC) भी दर्ज कर लिया था।
बैंक की आपत्ति: बैंक ने अदालत को बताया कि जब जांच सीबीआई के पास चली गई, तो चंडीगढ़ पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) ने 2 और 8 मई को बैंकों को पत्र भेजकर संदिग्ध खातों पर लगे 'लियन' (Lien) या 'फ्रीज' हटाने के निर्देश क्यों दिए। बैंक का तर्क है कि इन खातों से ही घोटाले की राशि का लेन-देन हुआ था और सुरक्षा कवच हटने से धन के गायब होने का खतरा था।
हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी: न्यायमूर्ति ने मौखिक रूप से कहा कि यदि जांच सीबीआई को ट्रांसफर हो चुकी है, तो वही एजेंसी प्रभारी है। अदालत ने पूछा कि ट्रांसफर के बाद चंडीगढ़ पुलिस के पास बैंकों को ऐसे निर्देश देने की शक्ति या कानूनी अधिकार कहां से आया।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हवाला:
सुनवाई के दौरान बैंक ने साइबर धोखाधड़ी और 'डिजिटल अरेस्ट' जैसे मामलों पर सर्वोच्च न्यायालय के हालिया दिशा-निर्देशों (दिसंबर 2025 और फरवरी 2026) का संदर्भ दिया। इन निर्देशों के तहत:
संदिग्ध राशि को एफआईआर दर्ज होने से पहले भी फ्रीज किया जा सकता है।
साइबर अपराध से जुड़ी धनराशि की सुरक्षा और उसे सुरक्षित रखना सर्वोपरि है।
अदालत का आदेश:
हाईकोर्ट ने यूटी प्रशासन के वकील को 2 और 8 मई के पत्रों के संबंध में विशेष निर्देश प्राप्त करने और यह स्पष्ट करने का आदेश दिया है कि जांच ट्रांसफर होने के बाद ये पत्र किस आधार पर जारी किए गए।