रांची न्यूज डेस्क: रांची यूनिवर्सिटी इन दिनों अपनी पीएचडी डिग्री के फॉर्मेट को लेकर सवालों के घेरे में है। शोधार्थियों की सबसे अहम अकादमिक पहचान मानी जाने वाली इस डिग्री में विषय (सब्जेक्ट) का उल्लेख न होना विवाद की वजह बन गया है।
दरअसल, यूनिवर्सिटी द्वारा जारी पीएचडी डिग्री में केवल संकाय (फैकल्टी) का नाम दर्ज होता है, जैसे “डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी इन सोशल साइंस” या “इन साइंस”। लेकिन इसमें यह स्पष्ट नहीं होता कि शोधार्थी ने राजनीति विज्ञान, इतिहास, बॉटनी या किसी अन्य विषय में विशेषज्ञता हासिल की है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फॉर्मेट अधूरा है और इससे छात्रों को व्यावहारिक दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
राज्य के अन्य विश्वविद्यालयों में स्थिति इससे अलग है, जहां पीएचडी डिग्री में विषय का स्पष्ट उल्लेख किया जाता है—जैसे “डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी इन केमिस्ट्री” या “इन पॉलिटिकल साइंस”। इससे उम्मीदवार की विशेषज्ञता सीधे तौर पर सामने आ जाती है। वहीं, रांची यूनिवर्सिटी के शोधार्थियों को हर जगह अपनी योग्यता साबित करने के लिए अतिरिक्त दस्तावेज प्रस्तुत करने पड़ रहे हैं।
केस स्टडी 1:
सोशल साइंस संकाय से पीएचडी करने वाले एक अभ्यर्थी विराट सिंह को दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर पद के इंटरव्यू के दौरान परेशानी झेलनी पड़ी। डिग्री में विषय का जिक्र न होने पर इंटरव्यू बोर्ड ने सवाल उठाए, जिसके बाद उन्हें अपनी थीसिस और अलग प्रमाणपत्र दिखाना पड़ा।
केस स्टडी 2:
साइंस संकाय के एक शोधार्थी अवधेश को राष्ट्रीय स्तर की रिसर्च परियोजना में आवेदन के दौरान दिक्कत आई। स्क्रीनिंग में यह स्पष्ट नहीं हो सका कि उनका विषय बॉटनी है या जूलॉजी, जिससे उनका आवेदन अटक गया। बाद में उन्हें विश्वविद्यालय से अलग से विषय प्रमाणपत्र बनवाना पड़ा।
दरअसल, संकाय और विषय के बीच स्पष्ट अंतर होता है। संकाय एक व्यापक श्रेणी है, जिसके अंतर्गत कई विषय आते हैं—जैसे सोशल साइंस में राजनीति विज्ञान, समाजशास्त्र, इतिहास, भूगोल और साइंस में केमिस्ट्री, फिजिक्स, बॉटनी, जूलॉजी। ऐसे में केवल संकाय का उल्लेख शोध की वास्तविक पहचान को अधूरा छोड़ देता है।
इस कमी के कारण शोधार्थियों को अक्सर रांची यूनिवर्सिटी से अलग से प्रमाणपत्र लेना पड़ता है, जिसमें उनके विषय का उल्लेख होता है। यह प्रक्रिया समय लेने वाली है और कई बार अवसरों पर भी असर डालती है।
आरयू के पूर्व सिंडिकेट सह सीनेट सदस्य का कहना है कि, “पीएचडी डिग्री में विषय का स्पष्ट उल्लेख बेहद जरूरी है। केवल संकाय लिख देने से शोधार्थी की विशेषज्ञता सामने नहीं आ पाती और उन्हें अनावश्यक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। विश्वविद्यालय को जल्द फॉर्मेट में बदलाव करना चाहिए।”
इस पूरे मामले पर यूनिवर्सिटी के परीक्षा नियंत्रक प्रो. संजय कुमार सिंह का कहना है कि मौजूदा फॉर्मेट पहले से ही लागू है और अन्य विश्वविद्यालयों के फॉर्मेट का अध्ययन करने के बाद ही किसी बदलाव पर फैसला लिया जाएगा।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या रांची यूनिवर्सिटी समय के साथ अपने डिग्री फॉर्मेट में बदलाव करेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार विषय का स्पष्ट उल्लेख जरूरी है, ताकि शोधार्थियों की पहचान और उनके करियर के अवसर सुरक्षित रह सकें।