चंडीगढ़ न्यूज डेस्क: मुंबई में तरबूज खाने से जुड़ी हालिया मौतों की खबरों ने प्रशासन को अलर्ट कर दिया है। शहर के खाद्य और स्वास्थ्य विभाग ने फल विक्रेताओं और थोक व्यापारियों के पास से तरबूज के रैंडम सैंपल लेने शुरू कर दिए हैं। मुख्य रूप से इस बात की जांच की जा रही है कि क्या तरबूजों में ऑक्सीटोसिन हार्मोन, कृत्रिम मिठास या लाल रंग की मिलावट की गई है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि मिलावट साबित करना तो आसान है, लेकिन उसे बीमारी का सीधा कारण बताना कानूनी रूप से चुनौतीपूर्ण है। इसके लिए अस्पताल और खाद्य विश्लेषण विभाग के बीच तालमेल जरूरी है। किसी ठोस कानूनी कार्रवाई के लिए फल में पाए गए बैक्टीरिया और मरीज के सैंपल में मौजूद बैक्टीरिया की 'जीनोटाइपिंग' (Genotyping) मैच होनी चाहिए। वर्तमान में हमारी लैब इस तरह की जांच के लिए पूरी तरह सुसज्जित नहीं हैं, जिससे सबूतों की कड़ी अधूरी रह जाती है।
डॉक्टरों के अनुसार, गर्मियों में "परफेक्ट" दिखने वाले कटे हुए फल अक्सर गंभीर गैस्ट्रोएंटेराइटिस (पेट का संक्रमण) का कारण बनते हैं। 'ब्रिटिश मेडिकल जर्नल' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, एक परिवार के छह सदस्य सिर्फ इसलिए बीमार पड़ गए क्योंकि उन्होंने इंजेक्शन से मीठा किया गया तरबूज खाया था। इंजेक्शन लगाने के लिए इस्तेमाल होने वाला दूषित घोल फल के अंदर 'ई.कोलाई' (E. coli) जैसे खतरनाक बैक्टीरिया पहुंचा देता है, जो आंतों को नुकसान पहुंचाते हैं।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर इम्यून सिस्टम वाले लोगों के लिए यह जानलेवा हो सकता है। मिलावट पहचानने के लिए FSSAI ने एक आसान तरीका बताया है: तरबूज के लाल हिस्से पर रुई (कॉटन बॉल) रगड़ें। अगर रुई लाल हो जाए, तो समझ लें कि इसमें 'एरिथ्रोसिन' जैसे रसायनों की मिलावट है। यदि रुई का रंग नहीं बदलता, तो फल खाने के लिए सुरक्षित है।